UGC Equity Regulations पर Supreme Court की रोक, Inclusion बना वजह
INDIAN DEFENCE
जनवरी 2026 में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” नाम से नए नियम जारी किए। इन नियमों का मूल उद्देश्य था भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकना और समावेशन (inclusion) को बढ़ावा देना।


इसके तहत यह तय किया गया कि हर विश्वविद्यालय/कॉलेज में Equal Opportunity Centres, Equity Committees और grievance redressal mechanisms बनाए जाएँ ताकि हर विद्यार्थी को समान अवसर मिल सके। समिति में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) के सदस्यों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य था, तथा 24×7 हेल्पलाइन, रिपोर्टिंग सिस्टम और समय-बद्ध समाधान प्रक्रिया भी शामिल थी।
इन नियमों को लागू करने का मकसद था कि छात्र/कर्मचारी अपने शैक्षणिक या सामाजिक जीवन में भेदभाव का सामना न करें और अगर कोई शिकायत है, तो उसका त्वरित निवारण हो। नियमों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 से भी जोड़ा गया था, जिससे यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही थी कि भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों में न्याय और सामाजिक समानता बनी रह सके।
क्या विवाद हुआ और Inclusion की वजह क्या रही?
इन नए Equity Regulations पर जल्द ही विवाद शुरू हो गया। विरोध के मुख्य कारण थे:
Definition और Scope: नियमों में “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा केवल SC, ST और OBC के सदस्यों तक सीमित थी। आलोचकों का कहना था कि इससे सामान्य (general) श्रेणी के छात्रों और अन्य समूहों को सुरक्षा और शिकायत निवारण प्रणाली से बाहर रखा जा रहा है, जो संविधान के Article 14 (समानता का अधिकार), Article 15 (भेदभाव के खिलाफ प्रावधान) और Article 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के खिलाफ है।
Vague (अस्पष्ट) Provisions: नियमों की भाषा कई जगहों पर इतनी अस्पष्ट थी कि इसे भिन्न-भिन्न तरीकों से लागू किया जा सकता था। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि नियमों में वाक्य संरचना और क्लॉज़ के अर्थ इतने स्पष्ट नहीं हैं कि यह misuse से बचा सके। अदालत ने चिंता जताई कि अगर अस्पष्ट शब्दों को लागू किया गया, तो यह अनुचित आरोपों और दुरुपयोग का कारण बन सकता है।
Social Division (समाज में विभाजन): कई विरोधियों ने यह आरोप लगाया कि नए नियम “समानता का वेश लेकर” वास्तव में भेदभाव को प्रतिस्थापित कर सकते हैं। मतलब यदि किसी समूह को बचाने के चक्कर में दूसरे समूहों को अलग-थलग किया जाए, तो यह समाज में दरार पैदा कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि अगर नियम इसी रूप में लागू हो गए, तो यह “समाज को बांट देगा” जैसा प्रभाव दे सकता है।
Protests & National Debate: देश के कई हिस्सों से छात्रों, शिक्षक संगठनों और सामाजिक समूहों की ओर से विरोध प्रदर्शन हुए, जिसमें कहा गया कि नियमों का कार्यान्वयन निष्पक्ष तरीके से नहीं हुआ और ये गलत दिशाओं में विचार किए गए।
Supreme Court का निर्णय और रोक क्यों?
29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने 2026 के Equity Regulations पर अंतरिम रोक (stay) लगा दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों को अभी लागू नहीं किया जाएगा और इसके स्थान पर 2012 के पुराने UGC नियम लागू रहेंगे जब तक अगली सुनवाई नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि वह नियमों की संवैधानिक वैधता, स्पष्टता और उनके संभावित दुरुपयोग के जोखिम को ध्यान से देखना चाहती है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि नियमों को लागू करने में यदि कोई गलती हो गई तो उससे “समाज में विभाजन” जैसा गंभीर परिणाम निकल सकता है। अदालत ने कहा कि नियमों को विशेषज्ञ समीक्षा और वकीलों / सरकार की दलीलों के आधार पर संशोधित होने की जरूरत है ताकि वे अपने लक्ष्य — समानता और समावेशन — को पूरा कर सकें बिना किसी वर्ग के साथ अन्याय किए।
Inclusion की वजह: न्यायालय की सोच
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया है कि इक्विटी और दलित/पिछड़े वर्ग के खिलाफ भेदभाव को रोकना आवश्यक है, लेकिन नियमों की शब्दावली और संरचना ऐसी होनी चाहिए जो समाज के सभी वर्गों को सुरक्षा दे। inclusion का मतलब यह नहीं कि किसी को “विशेषाधिकार” दिया जाए या किसी को बाहर रखा जाए, बल्कि यह कि नियमों को सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू किया जाए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि कोई भी वर्ग यह न महसूस करे कि नियम उनके खिलाफ हैं या उन्हें अलग-थलग कर रहे हैं।
आदालत ने कहा कि अगर नियमों में अस्पष्टता या संभावित दुरुपयोग की गुंजाइश है, तो वह inclusion और समानता के विरोधाभासी परिणाम पैदा कर सकते हैं। inclusion तभी सफल होता है जब नियम स्पष्ट, समावेशी और सबके लिए निष्पक्ष हों।
क्या आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 के लिए तय की है, जिसमें केंद्र सरकार, UGC और अन्य पक्षों की दलीलों को सुना जाएगा और संभवतः नियमों को संशोधित करने या उन्हें संविधान की कसौटी पर परखने का निर्णय लिया जाएगा। 2012 के पुराने नियम तब तक लागू रहेंगे, ताकि भेदभाव की शिकायतें न रुकें और विद्यार्थियों को सुरक्षा उपलब्ध होती रहे।
निष्कर्ष
UGC Equity Regulations 2026 पर सुप्रीम कोर्ट की रोक एक संतुलन की कोशिश है — एक ओर भेदभाव-रोधी प्रयास, और दूसरी ओर न्याय, संविधानिक अधिकार तथा inclusion को सुनिश्चित करना। inclusion तभी वास्तविक होगा जब नियमों को सभी वर्गों के लिए स्पष्ट, निष्पक्ष और अनुकूल बनाया जाएगा। कोर्ट का यह कदम शिक्षा नीति को मजबूत, न्यायपूर्ण और सामाजिक रूप से समावेशी बनाने की दिशा में देखा जा रहा है।
